डिजिटल पेमेंट की व्यवस्था फिर बेपटरी होने लगी है, सरकार को इसपर ध्यान देना होगा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले को करीब दो साल होने को हैं। इस कठिन निर्णय से लोगों को फायदा तो सीमित हुआ लेकिन परेशानियों का सामना अधिक करना पड़ा। नोटबंदी की यादों पर अब धूल की परत जम चुकी है। लोगों को जिन परेशानियों का सामना करना पड़ा था वे कुछ हद तक धुंधली भी पड़ गई हैं लेकिन राजनीतिक भूचाल और कुछ आर्थिक विश्लेषकों की रिपोर्ट इस जख्म को हरा कर देती है। इस फैसले का सबसे बड़ा कारण कालाधन व जाली नोट पर अंकुश लगाना था जो गैरकानूनी ढंग से बाजार में लेनदेन का जरिया बनी थी।

रिपोर्टों और विश्लेषकों की मानें तो सरकार को उसमें सफलता नहीं मिली जिसकी योजना उसने बनाई थी। गैरकानूनी ढंग से बाजार में आए पैसे के इस्तेमाल को रोकना ही उसका पहला मकसद था लेकिन उसमें वह सफलता नहीं मिल पाई जैसी उम्मीद प्रधानमंत्री मोदी और देश की जनता ने की थी। हालांकि दूसरी तरफ इसका बड़े पैमाने पर फायदा भी हुआ। देश में टैक्स जमा करने वालों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। घर में पैसा रखने का प्रचलन भी कुछ हद तक कम हुआ है। डिजिटल पेमेंट से भुगतान की व्यवस्था सुदृढ़ हुई है। इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा जो उसके लिए काफी सकारात्मक है।

86 फीसदी भारतीय मुद्रा को अवैध करार दिया
नवंबर 2016 में लागू नोटबंदी से बाजार में प्रचलन वाली 86 फीसदी भारतीय मुद्रा अवैध घोषित हो गई थी। उम्मीद यह थी कि जिन लोगों ने काला धन अपने पास जमाकर रखा है वे उसे नए नोट से बदलने के लिए बैंकों तक न पहुंचे। हालांकि हुआ इसके उलट। 500 और 1000 के 99.7 फीसदी नोट वापस बैंकों में पहुंच गए जबकि करोड़ों की रकम विभिन्न एजेंसियों ने छापेमारी में जब्त की। इससे स्पष्ट है कि उद्देश्य पूरा नहीं हो सका।

आर्थिक सुधार
नोटबंदी को लेकर देश के पूर्व वित्त मंत्री और अर्थव्यवस्था के जानकार पी. चिदंबरम का कहना था कि बाजार में नकदी की कमी से अर्थव्यवस्था में भूचाल जैसी स्थिति बन गई और जून 2017 की तिमाही में अर्थव्यवस्था अपने न्यूनतम स्तर 5.7 फीसदी पर पहुंच गई थी हालांकि बाद में अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ और पिछली तिमाही में 8.2 फीसदी तक पहुंच गई।

कर राजस्व
भारत में कर वसूली की व्यवस्था पहले से बेहतर हुई है। वित्तीय वर्ष मार्च 2017 के आंकड़ों के अनुसार व्यक्तिगत आयकर जमा करने वालों की संख्या में 27 फीसदी का इजाफा हुआ। पिछले कई दशकों से ये आंकड़ा 21 फीसदी के करीब था। मोदी सरकार में करदाताओं की संख्या का बढऩा अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है। सरकार को ध्यान देना होगा।

काला धन
2014 के आम चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल को देखते हुए संभवत: नोटबंदी का फैसला लिया गया। देश की जनता ने इसे सकारात्मक कदम बताया भले ही उसे बैंकों और एटीएम के बाहर लाइन में लगना पड़ा था। इस उम्मीद में कि इस फैसले से भ्रष्टाचार से पैसा कमाने वालों की रकम पूरी तरह डूब गई लेकिन उम्मीद के अनुसार जैसा कुछ खास नहीं हुआ।

डिजिटल भुगतान
नोटबंदी के बाद लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था तो डिजिटल भुगतान को अपनाया। ये व्यवस्था फिर से बेपटरी होने लगी है जिसको लेकर सरकार को ध्यान देना होगा। भारत में नकद लेनदेन का चलन है। एक रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी से पहले जनता के पास 17 लाख करोड़ रुपए की रकम कैश में थी जो इस वर्ष अगस्त में 18 लाख करोड़ तक पहुंच गई है।

नकली नोटों का भंडार हुआ पूरी तरह खत्म
सरकार ने संसद में पिछले महीने बताया था कि नोटबंदी के बाद असली नोट को सीज करने का प्रतिशत भी कम हुआ है। जिन एजेंसियों ने नोट को सीज करने की कार्रवाई की थी उसमें से अधिकतर नोट स्कैन या फोटोकॉपी किए हुए थे। कैश बैन ‘अल्पकालीन लाभ’ की स्थिति थी जिसमें नकली नोटों का भंडार देश मे इस फैसले से पूरी तरह खत्म हुआ था।

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